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ग़ज़ल
'अश्क' अपने सीना-ए-पुर-ख़ूँ में सैल-ए-अश्क भी
रोक रखता हूँ जिगर के ख़ून की तहलील तक
अश्क अमृतसरी
ग़ज़ल
अहसन अहमद अश्क
ग़ज़ल
जहाँ पहुँची हैं पर्दे चाक कर के 'इश्क़ की नज़रें
कहाँ तू ने वो मंज़र ऐ निगाह-ए-आम देखा है
अशक संभली
ग़ज़ल
सत्ह-ए-दरिया पर सुकूँ सा है मगर ऐ सत्ह-बीं
क़अ'र-ओ-दरिया में वही मौजें हैं तूफ़ानी हनूज़