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ग़ज़ल
सदा-ए-कलेमतुल-हक़ में तिरी तहरीक शामिल है
अनल-हक़ कहता है हर क़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर मेरा
मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़
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ग़ज़ल
सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर
तग़य्युर आब-ए-बर-जा-मांदा का पाता है रंग आख़िर
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
शामिल हैं सदा स'य-ए-‘अमल में सफ़ा मर्वा
का'बे की ज़मीं अस्ल में फ़िरदौस-ए-बरीं है
इरतिज़ा निशात
ग़ज़ल
सदमा-ए-शाम-ए-अजल मुझ को न बिल्कुल पहुँचे
गर मिरी दाद को कल तक भी वो काकुल पहुँचे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
न तोड़ते आरसी अगर तुम तो इतने यूसुफ़ नज़र न आते
ये क़ाफ़िला खींच लाई सारा शिकस्त-ए-आईना ज़ंग हो कर
नज़्म तबातबाई
ग़ज़ल
विसाल-ए-हक़ कभी मुश्किल कभी आसान लगता है
ज़रा सा फ़ासला है दरमियाँ दीवार अना की है
सदा अम्बालवी
ग़ज़ल
उस की सूरत से हूँ सन्ना-ए-अज़ल का क़ाइल
जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-हक़ हुस्न-ए-बशर है कि नहीं