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ग़ज़ल
आतिश-ए-ग़म ने ये ऐ 'सब्र' मुझे फूँका है
राख में अपनी हुआ हो के मैं पामाल सफ़ेद
अबुल बक़ा सब्र सहारनपुरी
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KHaak-e-sar-sayyad
ख़ाक-ए-सर-सय्यद خاک سر سید
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सर-आमद-ए-रोज़गार سَر آمَدِ روزگار
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ग़ज़ल
मय-ओ-माशूक़ से क्या बात कुछ मतलब नहीं रखते
बताओ तो कहाँ के 'सब्र' ऐसे पारसा तुम हो
अबुल बक़ा सब्र सहारनपुरी
ग़ज़ल
उतर जाता है रफ़्ता रफ़्ता सब नश्शा जवानी का
चला जाता है ख़ुद रंज-ए-ख़ुमार आहिस्ता आहिस्ता
अबुल बक़ा सब्र सहारनपुरी
ग़ज़ल
'सब्र' हंगाम-ए-तलब शर्त है निय्यत में ख़ुलूस
जाएगी बाब-ए-इजाबत पे दुआ तीसरे दिन
अबुल बक़ा सब्र सहारनपुरी
ग़ज़ल
सौदा जो 'सब्र' मुझ को है मिज़्गान-ए-यार का
नश्तर ही बन गए हैं मिरे मू-ए-तन तमाम
अबुल बक़ा सब्र सहारनपुरी
ग़ज़ल
'सब्र' मैं बार-ए-जसद छोड़ के क्यूँकर भागूँ
ज़िंदगानी मिरे सर पर है अज़ाब आख़िर-कार
अबुल बक़ा सब्र सहारनपुरी
ग़ज़ल
ऐ सबा चलती है क्यूँ इस दर्जा इतराई हुई
क्या नहीं है तू वही उस गुल की ठुकराई हुई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अगर हो सब्र-ओ-क़नाअत की दौलत ऐ 'परवीं'
गदा भी करते हैं वो ही जो शाह करते हैं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
नज़्म
लब पर नाम किसी का भी हो
बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ
तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
शेर
बे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ
तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है
इब्न-ए-इंशा
शेर
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ऐ दिल क़रार सब्र है लाज़िम फ़िराक़ में
बेताबियों से क्या वो तिरी आए जाते हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
हुस्न के बाब में 'अकबर' की सनद काफ़ी है
हम भी हर इक बुत-ए-कमसिन को परी कहते हैं
