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नज़्म
जज़्बात-ए-आफ़्ताब
सरफ़रोशों की तरह पहले मिटा दे ख़ुद को
हिन्द की ख़ाक से फिर लाल-ओ-गुहर पैदा कर
लाला अनूप चंद आफ़्ताब पानीपति
ग़ज़ल
सूँघती हैं उन्हें ख़ुश हो के बहिश्ती हूरें
सरफ़रोशों के बदन पर हैं जो तलवार के फूल
हाफ़िज़ कर्नाटकी
ग़ज़ल
है बस-कि तेग़ उस की रवाँ कमयाब हैं ना-कुश्तगाँ
सब सरफ़रोशों से कहो चंदे फ़रावानी करें
अहमद जावेद
ग़ज़ल
ये किस ज़ौक़-ए-नुमू को आज दोहराने बहार आई
लहू हम सरफ़रोशों का जबीन-ए-नाज़ पर मल कर
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
सूँघती हैं उन्हें ख़ुश हो के बहिश्ती हूरें
सरफ़रोशों के बदन पर हैं जो तलवार के फूल
हाफ़िज़ कर्नाटकी
ग़ज़ल
नहीं अहल-ए-वफ़ा की क़द्र तेरी बज़्म में लेकिन
कभी इन सरफ़रोशों की ज़रूरत हो तो सकती है
मैकश बदायुनी
नज़्म
ख़ून के फूल
जहाँ भी ख़ून टपकता है सरफ़रोशों का
बुलंद हो के वो धरती गगन से मिलती है
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
चाँद सुल्ताना
हनूज़ इन सरफ़रोशों के तराने हैं फ़ज़ाओं में
तिरी आवाज़-ए-पा महफ़ूज़ है अब तक हवाओं में
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
ग़ज़ल
ठिकाना एक ही रहता है कब आज़ाद बंदों का
कभी भी सरफ़रोशों का मकाँ ज़िंदाँ नहीं होता