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शेर
बयाबान-ए-जुनूँ में शाम-ए-ग़ुर्बत जब सताया की
मुझे रह रह कर ऐ सुब्ह-ए-वतन तू याद आया की
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
बयाबान-ए-जुनूँ में शाम-ए-ग़ुर्बत जब सताया की
मुझे रह रह के ऐ सुब्ह-ए-वतन तू याद आया की
बिस्मिल अज़ीमाबादी
नज़्म
शाम-ए-ग़ुर्बत
देखता हूँ छा रही है हर तरफ़
शाम-ए-ग़ुर्बत आज हिन्दोस्तान में
सय्यद अली हुसैन शाह अली
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ग़ज़ल
तीरा-रोज़ी याँ तलक तो है पर अब खाती है रश्क
शाम-ए-ग़ुर्बत है मिरी सुब्ह-ए-वतन को देख कर