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ग़ज़ल
ख़िज़ाँ का दौर हो या वो बहारों का ज़माना हो
कोई मौसम हो ऐ 'गुलशन' हमारी बात होती है
गुलशन बरेलवी
ग़ज़ल
फूल खिलते थे 'तालिब' ख़ुशबू रक़्स करती थी
आज शोले रक़्साँ हैं शाख़-ए-शाम-ए-गुलशन में