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ग़ज़ल
शान-ए-हैरत है कि जिस को संग कह देते हैं लोग
फिर वही दिल टूटने पर आइना कहलाए है
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
कितने अज़ीज़ हैं ये मसीहा को क्या ख़बर
वो ज़ख़्म-ए-दिल जो लज़्ज़त-ए-आज़ार तक गए
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
ख़ून-ए-दिल देना पड़ा ख़ून-ए-जिगर देना पड़ा
अपने ख़्वाबों की हसीं परछाइयाँ देना पड़ीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
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chashm-e-maa-raushan dil-e-maa-shaad
चश्म-ए-मा-रौशन दिल-ए-मा-शादچَشْمِ ما رَوشَن دِلِ ما شاد
आँख हमारी रौशन दिल हमारा प्रसन्न
din kaa bhuulaa shaam ko ghar aa jaa.e to use bhuulaa nahii.n kahte
दिन का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहतेدِن کا بُھولا شام کو گَھر آ جائے تو اُسے بُھولا نَہِیں کَہْتے
ग़लती का जल्द तदराक कर लिया जाये तो क़ाबिल माफ़ी है, जल्द इस्लाह कर लेना क़ाबिल मज़म्मत नहीं
sau din chor ke ek din shaah kaa
सौ दिन चोर के एक दिन शाह काسَو دِن چور کے ایک دِن شاہ کا
झूटे का झूट, मकअर् की मक्कारी और चोर की चोरी एक ना एक दिन पकरी जाती है
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नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
'शान' अब हम को तो अक्सर शब-ए-तन्हाई में
नींद आती नहीं और ख़्वाब नज़र आते हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
'शान' बे-सम्त न कर दे तुम्हें सहरा-ए-हयात
ज़ेहन में उन के नुक़ूश-ए-कफ़-ए-पा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बे-अमल लोगों से जब पूछो तो कहते हैं की 'शान'
हम अज़ल से क़िस्मत-ए-नाकाम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
कोई भी क़ैद-ए-मुसलसल मिरी क़िस्मत में न थी
मेरे सय्याद का दिल टूट गया है मुझ से
