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ग़ज़ल
पूछ मत 'अब्बाद' शहर-ए-फ़िक्र में
किस को शोहरत किस को रुस्वाई मिली
सैफ़ुर्रहमान अब्बाद ग़ाज़ीपूरी
नज़्म
हिज्र-ज़ाद
ये नहीं कि मुझ को अमाँ मिलेगी शब-ए-अबद के पड़ाव में
ज़रा इंतिज़ार कि जब वजूद का कूज़ा-गर
आफ़ताब इक़बाल शमीम
नज़्म
फ्लैश-बैक
वो अपने जिस्म का और हुस्न का जादू जगाती है
हरीम-ए-नाज़ को बद-ज़ातों से आबाद करती है
अबु बक्र अब्बाद
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shaam-e-abad
शाम-ए-अबद شامِ اَبَد
वो शाम जिस की कभी सुबह न हो, वह समय जब सृष्टि बिलकुल नष्ट हो जायगी
shaad-o-aabaad
शाद-ओ-आबाद شاد و آباد
जो प्रसन्न भी हो और समृद्ध भी।।
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ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
शेर
क्यूँ उजाड़ा ज़ाहिदो बुत-ख़ाना-ए-आबाद को
मस्जिदें काफ़ी न होतीं क्या ख़ुदा की याद को
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ की ज़ुल्मत में ग़म के मारों का
तिरे ख़याल की ताबिंदगी ने साथ दिया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
'शान' अब हम को तो अक्सर शब-ए-तन्हाई में
नींद आती नहीं और ख़्वाब नज़र आते हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ये तो सच है कि शब-ए-ग़म को सँवारा तुम ने
चश्म-ए-तर ने भी मिरा साथ निभाया है बहुत
सय्यदा शान-ए-मेराज
शेर
बद-क़िस्मतों को गर हो मयस्सर शब-ए-विसाल
सूरज ग़ुरूब होते ही ज़ाहिर हो नूर-ए-सुब्ह