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ग़ज़ल
जिस्म के दश्त में रक़्साँ थे महकते हुए ज़ख़्म
कल शब-ए-हिज्र का आलम शब-ए-बारात सा था
अभिनंदन पांडे
नज़्म
यादें
शब-ए-बरात पे मैं ने भी माँगी थी एक दुआ
उस के होंटों पर भी कितने हर्फ़ सुनहरे थे
फ़रहत ज़ाहिद
नज़्म
ख़िदमत-ए-अदब
मौसूफ़ ने बताई हमें वो पते की बात
अब दिन है रोज़-ए-ईद तो शब है शब-ए-बरात
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ की ज़ुल्मत में ग़म के मारों का
तिरे ख़याल की ताबिंदगी ने साथ दिया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ये तो सच है कि शब-ए-ग़म को सँवारा तुम ने
चश्म-ए-तर ने भी मिरा साथ निभाया है बहुत
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था