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ग़ज़ल
मैं चराग़-ए-शब-ए-हस्ती हूँ ज़िया क्या माँगूँ
ज़िंदा रहना है तो चलने के सिवा क्या माँगूँ
बद्र शम्सी
शेर
चराग़ शर्मा
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रेख़्ता शब्दकोश
shab-e-charaaG
शब-ए-चराग़ شَبِ چَراغ
एक बहुमूल्य रत्न जो रात में दीपक की तरह रोशनी देता है, रात्रि-दीपक, रात का चिराग़ अर्थात् चंद्रमा
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ग़ज़ल
चराग़ शर्मा
ग़ज़ल
जिस्म-ए-ख़ाकी तुझ को शीशे की हवेली ही सही
ऐ चराग़-ए-जाँ कभी फ़ानूस के बाहर तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
'फ़ज़ा' चराग़-ओ-शफ़क़ दोनों रहज़नों की मताअ'
जो ख़ैर चाहो तो रस्ते में शाम मत करना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
चराग़-ए-ज़िंदगी है या बिसात-ए-आतिश-ए-रफ़्ता
जला कर रौशनी दहलीज़-ए-जाँ पर सोचते रहना