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ग़ज़ल
बिखरे हुए गेसू हैं चमकते हुए 'आरिज़
कुछ अब्र का है कुछ शब-ए-महताब का 'आलम
धर्मपाल गुप्ता वफ़ा देहलवी
ग़ज़ल
इसी रंग-ए-कैफ़-ओ-नशात में शब-ए-माहताब गुज़र गई
कभी लब पे ग़ुंचे चटक उठे कभी रुख़ पे ज़ुल्फ़ बिखर गई
राम कृष्ण मुज़्तर
ग़ज़ल
जुनूँ-आवर शब-ए-महताब थी पी की तमन्ना में
कि बह कर रेल में अश्कों के हम थे सैर-ए-दरिया में
वली उज़लत
नज़्म
हिन्द की ये शब-ए-महताब
हिन्द की ये शब-ए-महताब बहुत ख़ूब सही
क़ल्ब-ए-अंजुम का मगर दर्द अभी कम तो नहीं
मसऊद हुसैन ख़ां
ग़ज़ल
रुख़-ए-महताब से कुछ भी अयाँ होता रहे लेकिन
ये कारोबार-ए-दुनिया सिर्फ़ अय्यारी से क़ाएम है
