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ग़ज़ल
अभी और तेज़ कर ले सर-ए-ख़ंजर-ए-अदा को
मिरे ख़ूँ की है ज़रूरत तिरी शोख़ी-ए-हिना को
अली सरदार जाफ़री
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ग़ज़ल
दस्त-ए-क़ातिल में कोई तेग़ न ख़ंजर होता
मिरा साया जो मिरे क़द के बराबर होता
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
यूँ तो चेहरे पे सजा रक्खी है इक बज़्म-ए-तरब
कितने मक़्तल हैं मिरे सीने के अंदर देखो


