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ग़ज़ल
तुझे कुछ 'शर्म' रखनी है अब इस अज़्म-ए-मुसम्मम की
सफ़र थोड़ा सा भी ऐ कारवाँ बाक़ी न रह जाए
शर्म लखनवी
ग़ज़ल
मुझ को आलूदा रखा इस मिरी गुमराही ने
अरक़-ए-शर्म-ए-गुनह भी तो बहाने न दिया
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
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'araq-e-shrm-e-gunah
'अरक़-ए-शर्म-ए-गुनह عَرَقِ شَرمِ گُنَہ
पाप के कारण लज्जा से आने वाला पसीना
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कुल्लियात
मस्ती में शर्म-ए-गुनह से मैं जो रोया डाढ़ मार
गिर पड़ा बे-ख़ुद हो वा'इज़ जुम’ए को मिम्बर समेत
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
शब को जब अबरू-ओ-मिज़्गाँ की सफ़-आराई हुई
शोख़ियों में दब गई शर्म-ओ-हया आई हुई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
वो सितम-पेशा कहाँ शर्म-ओ-हया रखते हैं
हम ग़रीबों पे हर इक ज़ुल्म रवा रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
हज़ार शर्म करो वस्ल में हज़ार लिहाज़
न निभने देगा दिल-ए-ज़ार ओ बे-क़रार लिहाज़