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नज़्म
हव्वा की बेटी
शिद्दत-ए-इफ़्लास से जब ज़िंदगी थी तुझ पे तंग
इश्तिहा के साथ थी जब ग़ैरत ओ इस्मत की जंग
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
शिद्दत-ए-ज़ब्त की लज़्ज़त को घटा देती हैं
आँखें नादान हैं क्यों अश्क बहा देती हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
क्या पान की सुर्ख़ी ने किया क़त्ल किसी को
शिद्दत से है क्यूँ आज तिरी तेग़-ए-ज़बाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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नज़्म
शाइ'र
दिन को वो जिगर-गोशा-ए-बेकारी-ओ-इफ़्लास
बिस्तर पे ख़यालात के जंगल में मिलेगा
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
इंक़लाब
तुझे भी देखेंगे मजबूर-ए-फ़ाक़ा-ओ-अफ़्लास
तुझे भी क़ैद-ए-ग़म-ओ-इज़्तिराब देखेंगे
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
बोलता क्यूँ नहीं
देखता क्यूँ नहीं आज बाज़ार में जश्न-ए-इफ़्लास है
शहर की भूक चोरी हुई
जावेद अनवर
नज़्म
मेरी शायरी और नक़्क़ाद
जागती ज़र्द सी आँखें न कहें लग जाएँ
दर्द-ए-इफ़्लास! ज़रा और चमक और चमक!
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
ख़ाना-ब-दोश
चेहरों पे ताज़्याना-ए-इफ़्लास के निशाँ
हर हर अदा से भूक की बेताबियाँ अयाँ