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नज़्म
सुब्ह की आमद के साथ
क़रीब-ए-सुब्ह सदा-ए-शिकस्त-ए-जाँ उभरी
लबों का ज़हर अचानक पिघल गया आख़िर
चन्द्रभान ख़याल
ग़ज़ल
शिकस्त-ए-जाँ से सिवा भी है कार-ए-फ़न क्या क्या
अज़ाब खींच रहा है मिरा बदन क्या क्या
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
तुलू-ए-सुब्ह है नज़रें उठा के देख ज़रा
शिकस्त-ए-ज़ुल्मत-ए-शब मुस्कुरा के देख ज़रा
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
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रेख़्ता शब्दकोश
maar ki.e jaa.o fatah-o-shikast to KHudaa ke haath me.n hai
मार किए जाओ फ़तह-ओ-शिकस्त तो ख़ुदा के हाथ में है مار کئے جاؤ فتح و شکست تو خد اکے ہاتھ میں ہے
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ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को
अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
इत्तिहाद
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
आफ़त-ए-जाँ उस परी से दिल लगाना हो गया
उस को क्या चाहा कि इक दुश्मन ज़माना हो गया