aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "shirk-e-a.azam"
हया आई दुबारा उस की जानिब देखते 'आज़म'कि पहली ही नज़र ने उस का पैराहन कतर डाला
चमन का हो के भी अहल-ए-चमन से ऐ 'आज़म'हमेशा ता'ने ही सहना कोई मज़ाक़ नहीं
था अज़ल से दिल-ए-'आज़म' में कोई और मकींउस में क्या इश्क़ हसीनाँ की समाई होती
फूलों के दिन बीत न जाएँ आओ आओ आ भी जाओकब तक झूटे वादों से तुम 'आज़म' को बहलाओगे
कमाल-ए-ज़ब्त के बा-वस्फ़ कोई भी 'आज़म'ये कैसे फट गया आतिश-फ़िशाँ न समझेगा
कहाँ 'फ़राज़' कहाँ 'आज़म'-ए-शिकस्ता-जाँज़रा सा चल के हम उस की डगर को देखते हैं
ज़िंदगी के कई मेआर हैंवरक़ वरक़इक रुख़-ए-एहसास कोफ़ितरी और मसनूई सतह पर बाँटनाअपने और पराए कोदो दाएरों में तक़्सीम करनाया बारूद के धमाकों मेंज़मीन को टुकड़े टुकड़े करनाज़िंदगी बराए ज़िंदगी को मानने वालेवक़्त का कोहरा छटते हीआस्था के अक्स फैला देते हैंपागल ख़याल की शिद्दत घट जाती हैउस पल शाख़-दर-शाख़फैलने वाली ख़ुशबूकिसी अजनबी कलाई परएक राखी बाँध देती हैपल भर में कड़वी सच्चाइयाँरिश्तों की तमाम हदें तोड़ करभाई बहन के रिश्ते में बदल जाती हैंज़ेहन में मौजूद तमाम तल्ख़ियाँख़ुशनुमा एहसास मेंख़ुद-बख़ुद ढल जाती हैं'इमाम-आज़म' की दुआ हैबे-मिसाल रिश्ते का ये बंधनसदा क़ाएम रहे
इस शहर में 'आज़म' जिसे तुम ढूँड रहे होआवारा-सिफ़त शाइ'र-ए-बदनाम मिलेगा
अदब की महफ़िलों में अब कहाँ जम्म-ए-ग़फ़ीर 'आज़म'यहाँ दो-चार बैठे हैं वहाँ दो-चार बैठे हैं
'आज़म' हज़ार बार लुटे राह-ए-इश्क़ मेंलेकिन कभी शिकायत-ए-दौराँ न कर सके
तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को ख़ुलूस और वफ़ा को'आज़म' ही नहीं आज सभी ढूँड रहे हैं
तस्कीन की सूरत कोई मिलती नहीं 'आज़म'मेरी निगह-ए-शौक़ है हैरान अभी तक
बस 'आज़म' आज तो हद ही ख़ुमार ने कर दीकहीं से घोल के ले आओ तैर-ए-रम का जिगर
शेर-ओ-सुख़न में यूँ तो गुज़ारी तमाम उम्रइस पर भी 'आज़म' एक सुख़न-दाँ न बन सका
किस मख़मसे में पड़ गया 'आज़म' तू आज-कलवहम-ओ-गुमाँ को छोड़ हुनर-वर की बात कर
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