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ग़ज़ल
इस क़दर मज़बूत मौसम पर रही किस की गिरफ़्त
मैं कि मुझ से सीना-ए-आब-ओ-हवा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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रेख़्ता शब्दकोश
bar-binaa-e-iKHlaas
बर-बिना-ए-इख़्लास بَر بِنائے اِخلاص
मित्रता के नाते, सच्चे प्रेम के कारण
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ग़ज़ल
रौज़ा-ए-अक़्दस पे आकर क्यों न ठहरें क़ाफ़िले
बाइ'स-ए-तस्कीन-ए-दिल है आस्ताना आप का
शकील इबन-ए-शरफ़
नज़्म
शा'इर
तर्जुमान-ए-जज़्बा-ए-अक़्दस तिरी फ़िक्र-ए-रसा
तू रुख़-ए-राज़-ए-हक़ीक़त से उठाता है नक़ाब
बिसमिल देहलवी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
सिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िम
बस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनों
जौन एलिया
नअत
अगर लिखना तवाफ़-ए-का'बा-ए-अक़्दस मुक़द्दर में
तो मेरे नाम तैबा की सुनहरी शाम लिख देना
शमीम अंजुम वारसी
ग़ज़ल
फिर हम थे और रौज़ा-ए-अक़्दस की जालियाँ
अरमान क्या बताऊँ कि क्या क्या मचल गए
तहनियतुन्निसा बेगम तहनियत
सलाम
हुसैन इब्न-ए-'अली के रौज़ा-ए-अक़्दस पे ले जा कर
मैं सब बच्चों को उन के हाथ पे बै'अत कराऊँगा
जब्बार वासिफ़
नअत
ख़ुदारा जल्द पहुँचा दीजिए मुझ को मदीने में
दर-ए-अक़्दस पे रख दूँ मैं जबीं फ़र्त-ए-‘अक़ीदत से
महवी सिद्दीक़ी
हास्य
रीश-ए-अक़्दस पान के धब्बों से रश्क-ए-लाला ज़ार
गेरुआ कुर्ता गले में हाथ में इक पुश्त ख़ार