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नज़्म
अँधेरी बस्ती
वक़्त शाहिद है कि हर दौर में तहज़ीब की माँग
क़त्ल-गाहों के तबस्सुम से शफ़क़-रंग रही
मुस्लिम शमीम
नज़्म
मुसलमान और हिन्दोस्तान
तारीख़ ब-हर दौर उलटती है वरक़ और
मज़हब में है लेकिन वतनियत का सबक़ और
हिन्दी गोरखपुरी
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ग़ज़ल
बे-दख़्ल दिल से मैं ने किया ख़्वाहिशात को
हैरत में डाल आया हूँ मैं काएनात को
माजिद जहाँगीर मिर्जा
ग़ज़ल
हक़ीक़त को अजब अंदाज़ से झुठलाया जाता है
ज़माने को ख़ुदा के नाम पर बहकाया जाता है
ओम प्रकाश लाग़र
ग़ज़ल
यूँ तरक़्क़ी का हमें सपना दिखाया जा रहा है
गाँव चुपके से अमीरों को लुटाया जा रहा है