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नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल
शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
बस यूँही जीते रहो
मुँह में कुछ खोखले बे-मअ'नी से जुमले रख लो
मुख़्तलिफ़ हाथों में सिक्कों की तरह घिसते रहो
निदा फ़ाज़ली
नज़्म
मुजरिम
जिन के अफ़्लास-ज़दा जिस्म, ढलकते सीने
चंद सिक्कों के एवज़ शब को बिका करते हैं
शकेब जलाली
नज़्म
फ़रेब
कह दिया हम से गुलिस्ताँ में बहार आई है
चंद सिक्कों के एवज़ चंद मिलों की ख़ातिर