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ग़ज़ल
कितने मसरूफ़ हैं मसरूर नहीं फिर भी ये लोग
है ये क्या सिलसिला-ए-कार-ए-ज़ियाँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
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ग़ज़ल
हुई है 'उम्र कि दिल को नज़र से रब्त नहीं
मगर ये सिलसिला-ए-चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ क्या है
अख़्तर सईद ख़ान
ग़ज़ल
रम-ब-रम सिलसिला-ए-मौज-ए-ग़ज़ालान-ए-ख़याल
दश्त-ए-ग़ुर्बत को बशारत हो वतन होने की