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ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को
अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
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रेख़्ता शब्दकोश
nauha-e-siina-zanii
नौहा-ए-सीना-ज़नी نَوحَۂ سِینَہ زَنِی
उन्नीसवीं शताब्दी के फारसी हास्य कवि मिर्जा अबुलहसन याग़्मा द्वारा आविष्कार की गई शोकगीत की एक शैली
deg-daan-e-siina
देग-दान-ए-सीना دیگ دانِ سِینَہ
(تصوّف) (کنایۃً) قلب انسانی.
aa.o puut silaa chane ghar kaa bhii le jaa.o
आओ पूत सिला चने घर का भी ले जाओ آؤ پوت سلاچنے گھر کا بھی لے جاؤ
शाबाश बेटा घर में कुछ न छोड़ना, सब कुछ उजाड़ देना
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ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ज़िंदगी
रंज-ए-ग़ुर्बत के सिवा जब्र के पहलू भी तो हैं
जो टपकते नहीं आँखों से वो आँसू भी तो हैं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
फ़ित्ना-ए-अक़्ल के जूया मिरी दुनिया से गुज़र
मेरी दुनिया में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
अब सिवा इस के मुदावा-ए-ग़म-ए-दिल क्या है
इतनी पी जाएँ कि हर रंज-ओ-मेहन को भूलें
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
चुप है हर ज़ख़्म-ए-गुलू चुप है शहीदों का लहू
दस्त-ए-क़ातिल है जो मेहनत का सिला माँगे है
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
इत्तिहाद
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
आफ़त-ए-जाँ उस परी से दिल लगाना हो गया
उस को क्या चाहा कि इक दुश्मन ज़माना हो गया
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
छुपा रहे न रुख़-ए-यार ज़ुल्फ़ में क्यूँ-कर
तक़य्या फ़र्ज़ है मोमिन को हिफ़्ज़-ए-जाँ के लिए
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
वो गर्म-ए-सर्फ़-ए-नाज़ थे वाँ बज़्म-ए-ग़ैर में
सरगर्म उस तरफ़ मिरा दिल सर्फ़-ए-जाँ में था
हकीम आग़ा जान ऐश
रेख़्ती
ऐ 'जान' दिल मैं बेचूँगी अब कौड़ियों के मोल
रहती है मुझ को रोज़ ख़रीदार की तलाश
मीर यार अली जान
रेख़्ती
जाड़े में फूट निकला ये गर्मी का ज़ोर है
ऐ 'जान' किस सिड़न से हुआ तू कहाँ ख़राब