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ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
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रेख़्ता शब्दकोश
jo maa.n se sivaa chaahe vo phaaphaa kuTnii
जो माँ से सिवा चाहे वो फाफा कुटनीجو ماں سے سِوا چاہے وہ پھاپھا کُٹْنی
(ओ) माँ से ज़्यादा मुहब्बत करना सरासर धोका और बनावट है
aa.o puut silaa chane ghar kaa bhii le jaa.o
आओ पूत सिला चने घर का भी ले जाओآؤ پوت سلاچنے گھر کا بھی لے جاؤ
शाबाश बेटा घर में कुछ न छोड़ना, सब कुछ उजाड़ देना
maa.n se sivaa chaahe, so phaaphaa kaTnii kahlaa.e
माँ से ज़्यादा चाहे, सो फाफा कटनी कहलाएماں سے سِوا چاہے، سو پھاپھا کَٹْنی کَہلائے
माँ से ज़्यादा मुहब्बत जतलाना ग़रज़ से ख़ाली नहीं होता
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नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन
तेरे गहवारा-ए-आग़ोश में ऐ जान-ए-बहार
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ज़िंदगी
रंज-ए-ग़ुर्बत के सिवा जब्र के पहलू भी तो हैं
जो टपकते नहीं आँखों से वो आँसू भी तो हैं