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ग़ज़ल
ऐ 'फ़िराक़' उठती हैं हैरत की निगाहें बा-अदब
उस के दिल की ख़ल्वतों में हो रहा हूँ बारयाब
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
तिरे ग़म की उम्र-ए-दराज़ में कई इंक़लाब हुए मगर
वही तूल-ए-शाम-ए-'फ़िराक़' है वही इंतिज़ार-ए-सहर भी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ 'फ़िराक़'
मेहरबाँ ना-मेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
मैं अदम अंदर अदम मैं हूँ जहाँ अंदर जहाँ
एक ही दुनिया हो मेरी ऐ 'फ़िराक़' ऐसा नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
काश अपने दर्द से बेताब होते ऐ 'फ़िराक़'
दूसरे के हाथों ये हाल-ए-परेशाँ कुछ नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
आज़ादी
तरन्नुम-ए-सहरी दे रहा है जो छुप कर
हरीफ़-ए-सुब्ह-ए-वतन है ये शाम-ए-आज़ादी