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नज़्म
शहीद-ए-मिल्लत-ओ-वतन!
ग़ुबार-ए-रह तिरा है हर जवाँ को सुरमा-ए-नज़र
तिरे चराग़ से सहर की मिल गई हमें ख़बर
एस. ए. रहमान
ग़ज़ल
दिल की चोरी में जो चश्म-ए-सुर्मा-सा पकड़ी गई
वो था चीन-ए-ज़ुल्फ़ में ये बे-ख़ता पकड़ी गई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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नज़्म
आज भी
आज भी अश्क-ए-ख़ूँ मिरा क़श्क़ा जबीन-ए-नाज़ का
आज भी ख़ाक-ए-दिल मिरी सुरमा-ए-चश्म-ए-गुल-रुख़ाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
गो कि औरों की हुईं सुरमे से आँखें रौशन
सुर्मा-ए-बीनिश-ए-साहिब-नज़राँ और ही है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
उन की नज़रों पे जो चढ़ जाए वही ज़र्रा-ए-ख़ाक
सुर्मा-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँ है ये मा'लूम हुआ
सबा अकबराबादी
क़ितआ
हल्क़ा-ए-ज़ुल्फ़ हो या सुरमा-ए-चशम-ए-ख़ूबाँ
हल्क़ा-ए-दाम ख़याली नज़र आता है उन्हें
अली सरदार जाफ़री
नअत
क्यों न मंज़ूर-ए-नज़र हो तेरे कूचे का ग़ुबार
'ऐन ये तो सुर्मा-ए-चश्म-ए-बसीरत हो गया