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नज़्म
ये बस्ती मेरी बस्ती है
जिस के फ़र्श पर तड़के के जैसा नूर था
ठंडक थी और आसूदगी हर-सू
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
इक सन्नाटा सा तारी है चार-पहर के तड़के से
ख़ैर तो है ये आज मरीज़-ए-हिज्र ने क्या ठहराई है
तालिब बाग़पती
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ta.Dke
तड़के تَڑْکے
दिन निकलने का समय, जिसमें रात्रि का अन्धकार घटने लगता है और कुछ-कुछ प्रकाश होने लगता है, मुहा०-(किसी बात का) तड़का होना = (क) पूर्ण रूप से अभाव होना। जैसे-पूंजी निकल जाने से घर में तड़का हो गया, (किसी व्यक्ति का) तड़का होना आघात, प्रहार आदि के कारण होश-हवास गुम हो जाना
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ग़ज़ल
जो रात को अपने साथ लिए आए थे शहर की गलियों में
अब नूर के तड़के सुब्हों के आसार की बातें करते हैं
बशीर अहमद शाद
ग़ज़ल
माथे पर सिन्दूर की बिंदिया थाली में कुछ सुर्ख़ गुलाब
नूर के तड़के ऊषा तट पर पूजा करने आई धूप
नो बहार साबिर
ग़ज़ल
मोहम्मद इज़हारुल हक़
नज़्म
नन्ही मुन्नी चिड़ियाँ
उठ के तड़के फिर अपनी चूँ चूँ से
अपने मालिक के गीत गाती हैं
महवी सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मोहम्मद शम्सुद्दीन आजिज़
ग़ज़ल
जब तड़के समय का पात खुला चमकीली ग़ज़ल भी जाग पड़ी
हम ने भी छुअन की मेहमानी में आईने की सरिश्त रखी
यासिर इक़बाल
नज़्म
बच्चे की अव्वलीन दरस-गाह
नूर के तड़के जगाना मुँह धुलाना प्यार से
देख कर मुखड़े को कहना आफ़रीं सद आफ़रीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
ग़ज़ल
आँखों में इंतिज़ार की लाया है बारिशें
अबरू पे हाथ तड़के में चुँधियाना 'इश्क़ है