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ग़ज़ल
रसाई देखिए कब ता-दर-ए-मक़्सूद होती है
नहीं जुज़ ज़ौक़-ए-सादिक़ और कोई राहबर अपना
शेर सिंह नाज़ देहलवी
ग़ज़ल
ता-दर-ए-यार पहुँचता है वो ख़ुद-रफ़्ता-ए-शौक़
अपनी हस्ती से जो इस राह में बेगाना बने
बर्क़ देहलवी
ग़ज़ल
लग़्ज़िश-ए-पा ने दिया हर राह में धोका मुझे
ता-दर-ए-मंज़िल तू ही ऐ जज़्ब-ए-दिल पहुँचा मुझे