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ग़ज़ल
हैं मसरूफ़-ए-'अमल ता-हद्द-ए-इम्काँ राह-ए-ख़िदमत में
ख़याल-ए-हश्र को अंदेशा-ए-बातिल समझते हैं
जलील क़िदवई
ग़ज़ल
हिजाब-ए-जिस्म-ओ-जाँ में हुस्न-ए-पिन्हाँ देख लेते हैं
नज़र वाले तुम्हें ता-हद-ए-इम्काँ देख लेते हैं
अफ़क़र मोहानी
ग़ज़ल
पहले उड़ने की दावत दी ता-हद्द-ए-इम्कान 'सिराज'
फिर जाने क्यूँ ख़ुद ही उस ने क़त्अ पर-ए-परवाज़ किया
सिराज अजमली
ग़ज़ल
या तो तुम हद्द-ए-तअ'य्युन पे रहो जल्वा-फरोज़
या मिरी ताब-ए-नज़र ता-हद-ए-इम्काँ कर दो
शिफ़ा ग्वालियारी
ग़ज़ल
आख़िर बयान कर ही दिया उस से हाल-ए-दिल
हम एहतियात ता-हद-ए-इम्काँ न कर सके
राणा ख़ालिद महमूद कैसर
ग़ज़ल
ज़िंदगी ता-हद-ए-इम्काँ है सराबों का सफ़र
फिर भी गुंजाइश-ए-ईमाँ है बहर-गाम बहुत
जमुना प्रसाद राही
ग़ज़ल
पाँव शल हो गए लेकिन न पता तेरा मिला
जुस्तुजू में तिरी मैं ता-हद-ए-इम्कान गया