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नज़्म
नक़्श-ए-जमील
तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन दुनिया से जो मुझ को मिली
झलकियाँ उस की न आईं कुछ मिरी तहरीर में
अख़तर बस्तवी
ग़ज़ल
उसी मय-ख़्वार की अज़्मत है साक़ी की निगाहों में
जिसे 'ज़मज़म' गवारा तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन भी है
सूफ़ी अय्यूब ज़मज़म
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रेख़्ता शब्दकोश
navaa raa talKH-tar mii-zan chuu zauq-e-naGma kam-yaabii
नवा रा तल्ख़-तर मी-ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबी نَوَاْ رَا تَلْخْ تَرْ مِیْ زَنْ چُو ذَوْقِ نَغْمَہ کَم یَابِیْ
(इक़्बाल का यह फ़ारसी मिसरा कहावत के रूप में उर्दू में प्रयुक्त) जब आप राग में रूची कम देखो, तो आवाज़ में अधिक प्रभाव पैदा करो अर्थात जब आप देखो हैं कि लोग आपके प्रति आकर्षित नहीं हैं, तो अधिक प्रभावी ढंग से बात कहो
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ग़ज़ल
रग-ओ-पय में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिए क्या हो
अभी तो तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन की आज़माइश है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
न रास आई कभी मुझ को बज़्म-ए-कम-नज़राँ
'फ़ज़ा' भी बैठ के इन पागलों में क्या करता
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ख़ाल-ओ-ख़त के वरक़ लम्हा-ए-रफ़्ता कब का चुरा ले गया
क्या छुपाते हैं अब मेरी बे-चेहरगी की ख़बर आइने
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं