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ग़ज़ल
इक क़लंदर की तरह वक़्त रहा महव-ए-ख़िराम
उस ने कब ध्यान ''तलब'' शोर-ए-सगाँ पर रक्खा
ख़ुर्शीद तलब
ग़ज़ल
तलब-ए-बोसा-ए-रुख़्सार को जाने दीजे
कौन सी बात है जिस में तुम्हें इंकार नहीं
मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी
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ग़ज़ल
याद आता है क्या क्या तलब-ए-बोसा-ए-लब पर
मुँह फेर के घूँघट में वो शर्माना किसी का
नवाब उमराव बहादूर दिलेर
ग़ज़ल
बोसा माँगा तो कहा शुक्र-ए-ख़ुदा अच्छा हूँ
बात क्या जल्द उड़ाई है इलाही तौबा
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
करता हूँ जो बार बार बोसा-ए-रुख़ का सवाल
हुस्न के सदक़े से है मुझ को गदाई का इश्क़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अल्लाह-रे उस की चौखट है बोसा-गाह-ए-आलम
कहता है संग-ए-असवद मैं संग-ए-आस्ताँ हूँ