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ग़ज़ल
तलब-ए-बोसा-ए-रुख़्सार को जाने दीजे
कौन सी बात है जिस में तुम्हें इंकार नहीं
मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी
ग़ज़ल
याद आता है क्या क्या तलब-ए-बोसा-ए-लब पर
मुँह फेर के घूँघट में वो शर्माना किसी का