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शेर
दस्त-ए-शिकस्ता अपना न पहुँचा कभी दरेग़
वाँ तर्फ़-ए-दोश बर-सर-ए-दस्तार ही रहा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
इतनी भी दिल से एहतियात बर्क़-ए-जमाल-ए-यार क्या
शौक़-ए-उमीद-वार देख तरफ़-ए-उमीद-वार क्या
मुनीर भोपाली
ग़ज़ल
कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी
न किसी का दामन-ए-चाक था न किसी की तर्फ़-ए-कुलाह थी
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
जानते सब हैं कि हम रखते हैं ख़म तर्फ़-ए-कुलाह
और क्यों रखते हैं ये अहल-ए-सितम जानते हैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ज़िंदगी तेरी है बे-रोज़-ओ-शब-ओ-फ़र्दा-ओ-दोश
ज़िंदगी का राज़ क्या है सल्तनत क्या चीज़ है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कराची का ट्रैफ़िक
जा-ब-जा बोर्ड पे लिक्खा है कि ख़ामोश रहो
''फ़िक्र-ए-फ़र्दा न करो महव-ए-ग़म-ए-दोश रहो''