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ग़ज़ल
तरफ़ा-ए-सोहबत है कि सुनता नहीं तू एक मिरी
वास्ते तेरे सुना मैं ने सुना क्या क्या कुछ
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
तरफ़ा-ए-सोहबत है कि सुनता नहीं तू एक मिरी
वास्ते तेरे सुना मैं ने सुना क्या क्या कुछ
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
शेर
इब्न-ए-इंशा
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ग़ज़ल
ऐ ख़्वाहिश-ए-यक-तरफ़ा-ए-ताराज-ए-जुनूँ सुन
सुन दिल के क़रीं ज़मज़मा-ए-कुन-फ़यकूँ सुन
शाइस्ता सहर
ग़ज़ल
करूँ 'उज़्र-ए-तर्क-ए-सोहबत सो कहाँ वो बे-दिमाग़ी
न ग़ुरूर-ए-मीरज़ाई न फ़रेब-ए-ना-तवानी
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ठहर ऐ गर्दिश-ए-अय्याम हम भी साथ चलते हैं
उठा लेने दे फ़ैज़-ए-सोहबत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ पहले
अर्श सहबाई
ग़ज़ल
का'बा में जा रहा तो न दो ता'ना क्या कहें
भूला हूँ हक़्क़-ए-सोहबत-ए-अहल-ए-कुनिश्त को
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बहुत दिन से मुसिर इस बात पर वो मेहरबाँ है
कि मैं दिल को रहीन-ए-सोहबत-ए-नाशाद कर दूँ