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ग़ज़ल
ज़िंदगी तक के हैं रिश्ते ज़िंदगी तक है बहार
तुम कहीं ऐ 'तर्ज़' होगे वो कहीं मरने के बाद
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
तिरी इक निगाह से साक़िया वो बहार-ए-बे-ख़बरी रही
गुल-ए-तर वही गुल-ए-तर रहा वही डाल डाल हरी रही
गणेश बिहारी तर्ज़
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ग़ज़ल
'तर्ज़' पढ़ता है कोई जब झूम कर नज़्म ओ ग़ज़ल
ऐसा लगता है 'फ़िराक़' ओ 'जोश' हैं यारों के बीच
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
यूँ बिखरता ही रहा ऐ 'तर्ज़' हर सपना मिरा
सुब्ह जैसे ख़्वाब का मंज़र बने और टूट जाए
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
मस्ती भी है समाँ भी है महफ़िल-ए-दिलबराँ भी है
ऐसे में 'तर्ज़' झूम कर रंग-ए-ग़ज़ल जमाए जा
गणेश बिहारी तर्ज़
शेर
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
अल्फ़ाज़ ढूँडते ही रहे तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू
वो हुस्न था कि कूज़े में दरिया सिमट गया