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शेर
ग़ज़ल लुत्फ़-ओ-असर पा कर ब-तर्ज़-ए-'मीर' रक़्साँ है
चलो बरपा करें महफ़िल चलो देखें शरर लुटता
ख़ुमार कुरैशी
ग़ज़ल
साँसों की जल-तरंग पर नग़्मा-ए-इश्क़ गाए जा
ऐ मिरी जान-ए-आरज़ू तू यूँही मुस्कुराए जा
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
इक यही ग़म खाए जाता है कि उस का होगा क्या
कौन रक्खेगा मिरा हुस्न-ए-यक़ीं मरने के बाद
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
तिरी इक निगाह से साक़िया वो बहार-ए-बे-ख़बरी रही
गुल-ए-तर वही गुल-ए-तर रहा वही डाल डाल हरी रही
गणेश बिहारी तर्ज़
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रेख़्ता शब्दकोश
miir-e-'arz
मीर-ए-'अर्जمِیرِ عَرْض
बादशाह के सामने प्रार्थनापत्र पेश करने वाला (पेशकार), शाही कर्मचारी
navaa raa talKH-tar mii-zan chuu zauq-e-naGma kam-yaabii
नवा रा तल्ख़-तर मी-ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीنَوَاْ رَا تَلْخْ تَرْ مِیْ زَنْ چُو ذَوْقِ نَغْمَہ کَم یَابِیْ
(इक़्बाल का यह फ़ारसी मिसरा कहावत के रूप में उर्दू में प्रयुक्त) जब आप राग में रूची कम देखो, तो आवाज़ में अधिक प्रभाव पैदा करो अर्थात जब आप देखो हैं कि लोग आपके प्रति आकर्षित नहीं हैं, तो अधिक प्रभावी ढंग से बात कहो
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ग़ज़ल
'तर्ज़' पढ़ता है कोई जब झूम कर नज़्म ओ ग़ज़ल
ऐसा लगता है 'फ़िराक़' ओ 'जोश' हैं यारों के बीच
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
यूँ बिखरता ही रहा ऐ 'तर्ज़' हर सपना मिरा
सुब्ह जैसे ख़्वाब का मंज़र बने और टूट जाए
गणेश बिहारी तर्ज़
शेर
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
ग़ज़ल लुत्फ़-ओ-असर पा कर ब-तर्ज़-ए-'मीर' रक़्साँ है
चलो बरपा करें महफ़िल चलो देखें शरर लुटता
ख़ुमार कुरैशी
ग़ज़ल
देहली में रहना है अगर तो तर्ज़-ए-मीर ज़रूरी है
उस ने भी तो इश्क़ किया फिर याँ रहना आग़ाज़ किया
सिराज अजमली
कुल्लियात
हैराँ है लहज़ा लहज़ा तर्ज़-ए-अजब-अजब का
जो रफ़्ता-ए-मोहब्बत वाक़िफ़ है उस के ढब का