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ग़ज़ल
क्या पढ़े अशआ'र 'तस्लीम'-ए-जिगर-अफ़्गार ने
शोर-ए-तहसीं हर तरफ़ बज़्म-ए-सुख़न-दाँ में रहा
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
आ गया काबे में जब मेहराब-ए-अबरू का ख़याल
बैठ कर 'तस्लीम'-ए-ख़स्ता क़िबला-रू रोने लगा
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
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ग़ज़ल
आस क्या अब तो उमीद-ए-ना-उमीदी भी नहीं
कौन दे मुझ को तसल्ली कौन बहलाए मुझे
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
दिखाएँ हुस्न-ए-बयाँ शाइरी में क्या 'तस्लीम'
ज़बान आए न अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू आए
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
आज उज़्र-ए-इत्तिक़ा 'तस्लीम' कल तक यार से
आप को देखा सर-ए-बाज़ार हँसते बोलते
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
क्या कोहकन ओ क़ैस को देते दम-ए-तक़सीम
हिस्सा था ग़म-ए-हौसला-फ़रसा मिरे दिल का
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
फ़स्ल-ए-गुल आई बढ़े जोश-ए-जुनूँ के वलवले
फिर वही 'तस्लीम' अपनी ग़ैर हालत हो गई
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
'तस्लीम' रू-ए-यार को हसरत की आँख से
अच्छा नहीं है शौक़ में हर बार देखना
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
ख़ुश हैं मेरे मरने से 'तस्लीम' ख़्वेश ओ अक़रिबा
ख़ाना-ए-शादी है गोया ख़ाना-ए-मातम नहीं
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
जब से ऐ 'तस्लीम' की है बैअ'त-ए-दस्त-ए-सुबू
दीन साग़र हो गया ईमान मीना हो गया
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
अदम में तरसोगे दर्द-ए-जिगर को ऐ 'तस्लीम'
जो हो सके कोई सीने पे तीर खाए चलो
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
ये भी तक़दीर के हैं पेच वगरना 'तस्लीम'
मुझ सा आज़ाद हो पाबंद-ए-मोअम्बर गेसू
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
शेर
ज़माने से निराला है उरूस-ए-फ़िक्र का जौबन
जवाँ होती है ऐ 'तस्लीम' जब ये पीर होती है
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
मैं हूँ ऐ 'तस्लीम' शागिर्द-ए-'नसीम'-ए-देहलवी
चाहिए उस्ताद का तर्ज़-ए-बयाँ पैदा करूँ
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
क्या रुके ख़ामा-ए-'तस्लीम' दम-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न
तब' में आज है दरिया की रवानी वा'इज़
