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नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
वक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहीं
वक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
कभी वो देखते हैं अपने तेग़ ओ बाज़ू को
कभी वो ग़ैज़ से मुझ पर निगाह करते हैं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्या भड़के है सीने में मिरे आतिश-ए-फ़ुर्क़त
जो आह के हम-राह निकलता है धुआँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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ग़ज़ल
ज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त को तिरी याद ने भरने न दिया
ग़म-ए-तंहाई मगर रुख़ पे उभरने न दिया
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
दस्त-ए-क़ातिल में कोई तेग़ न ख़ंजर होता
मिरा साया जो मिरे क़द के बराबर होता
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन
काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
मुझ से न पूछ अपनी ही तेग़-ए-अदा से पूछ
क्यूँ तेरी चश्म-ए-लुत्फ़ भी मरहम न हो सकी
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
दीवाली
तेग़-ए-फ़ुर्क़त से जिगर पाश हुआ जाता है
दिल ग़म-ए-रंज से पामाल हुआ जाता है
आफ़ताब रईस पानीपती
ग़ज़ल
हाल-ए-सोज़-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त करूँ तहरीर तो हो
कब्क की चोंच क़लम बाल समुंदर काग़ज़
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
निज़ाम-ए-आलम-ए-फ़ुर्क़त ख़िलाफ़-ए-क़ुदरत था
न माहताब ही निकला न आफ़्ताब आया