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कुल्लियात
है गरचे तिफ़्ल-ए-मकतब वो शोख़ अभी तो लेकिन
जिस से मिला है उस का उस्ताद हो मिला है
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
दबिस्तान-ए-सुख़न में तिफ़्ल-ए-मकतब थे 'ज़हीर'-ए-मन
वगरना इन ज़मीनों को ग़ज़ल की आसमाँ करते
ज़हीर हसनैन
ग़ज़ल
तिफ़्ल-ए-मकतब हूँ 'शिफ़ा' मय-ख़ाना-ए-‘मख़मूर’ में
ज़ेब देते हैं मुझे कब साग़र-ओ-मीना अभी
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
पत-झड़
अभी तक इस ज़वाल-ए-दिलबरी का दिल को मातम है
मैं हैराँ हूँ कि क्या यज़्दाँ भी कोई तिफ़्ल-ए-मकतब है
उबैदुर्रहमान आज़मी
ग़ज़ल
वो तिफ़्ल-ए-मकतब-ए-रस्म-ए-वफ़ा हमीं तो न थे
जो अपनी यादों का मेला लगा के बैठ रहे
शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा
ग़ज़ल
हम समझते हैं पढ़ाई हुई बातें न करो
तिफ़्ल-ए-मकतब हो तुम ऐ जाँ अभी उस्ताद हैं हम