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नज़्म
मुझे मत बताना
बातों के वादों के शहर-ए-तिलिस्मात में
आँख पर ख़ुश-गुमानी की पट्टी लिए
परवीन शाकिर
नज़्म
आज शब कोई नहीं है
आज शब दिल के क़रीं कोई नहीं है
आँख से दूर तिलिस्मात के दर वा हैं कई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
हम को रोना है तो रो लेंगे कहीं भी जा कर
हुस्न की बज़्म-ए-तिलिस्मात ज़रूरी तो नहीं
गोपाल कृष्णा शफ़क़
नज़्म
जिस रोज़ क़ज़ा आएगी
बे-तलब पहले-पहल मर्हमत-ए-बोसा-ए-लब
जिस से खुलने लगें हर सम्त तिलिस्मात के दर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
फ़ना
जितना ये ख़ाक का है तिलिस्मात बन रहा
फिर ख़ाक उस को होता है यारो जुदा जुदा
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हम परी-ज़ादों में खेले शब-ए-अफ़्सूँ में पले
हम से भी तेरे तिलिस्मात का 'उक़्दा न खुला
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
तर्क-ए-मोहब्बत के बा'द
बेद-ए-मजनूँ के तिलिस्मात से पल-पल छनती
आसमानों को लपकती हुई इक तान की याद

