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ग़ज़ल
सुब्ह ना-पैदा है कुल्फ़त ख़ाना-ए-अदबार में
तोड़ना होता है रंग-ए-यक-नफ़स हर शब मुझे
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
महात्मा गाँधी
जो न दाग़ चेहरा मिटा सके उन्हें तोड़ना ही था आइना
जो ख़ज़ाना लूट सके नहीं उसे रहज़नों ने लुटा दिया
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
जो तेरी बाहों में दम तोड़ना मुयस्सर हो
तो मुझ को मौत की आमद भी ज़िंदगी सी लगे
विजेंद्र सिंह परवाज़
ग़ज़ल
अजब रंग-ए-तअल्लुक़ है मोहब्बत का मिरे दिल से
कि उस को तोड़ना भी और सदा के साथ भी रहना