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ग़ज़ल
क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन
हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
क्या गुल-बदनी है
हुजरे में ख़मोशी है शबिस्ताँ में तकल्लुम
ख़ेमे में तुनुक आह ख़यालों में तरन्नुम
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जश्न का दिन
तुनुक-मिज़ाज है साक़ी न रंग-ए-मय देखो
भरे जो शीशा चढ़ाओ कि जश्न का दिन है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
है तुनुक-मिज़ाज सय्याद कुछ अपना बस नहीं है
मैं क़फ़स को ले के उड़ता अगर इख़्तियार होता
यगाना चंगेज़ी
ग़ज़ल
मैं बहक जाऊँ तो ये मेरी तुनुक-ज़र्फ़ी है
और अगर नश्शा न हो किस की हतक है साक़ी
एहसास मुरादाबादी
ग़ज़ल
दामन-ए-बाद को है दौलत-ए-शबनम काफ़ी
रूह को ज़िक्र-ए-तुनुकबख़्शी-ए-दरिया न सुना