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ग़ज़ल
अदू-ए-दीन-ओ-ईमाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-अमाँ निकले
तिरे पैकाँ बड़े जाबिर बड़े ना-मेहरबाँ निकले
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ग़ज़ल
कोई समझा दे इतना इस अदू-ए-दीन-ओ-ईमाँ को
तिरी काफ़िर-अदा क्यों छेड़ती है हर मुसलमाँ को
सफ़दर मिर्ज़ापुरी
ग़ज़ल
वो फ़क़ीह-ए-कू-ए-बातिन है अदू-ए-दीन-ओ-मिल्लत
किसी ख़ौफ़-ए-दुनियवी से जो तराश दे फ़साना
माहिर-उल क़ादरी
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ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
ख़ून-ए-दिल देना पड़ा ख़ून-ए-जिगर देना पड़ा
अपने ख़्वाबों की हसीं परछाइयाँ देना पड़ीं