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नज़्म
जुदाई
ज़मीं से उखड़े जाते हैं दरख़्तों के क़दम पैहम
चटानें रूप बदले ज़ेर-ए-लब कुछ पढ़ती जाती हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
देखा तो इस चमन में बाद-ए-ख़िज़ाँ के हाथों
उखड़े हुए ज़मीं से क्या क्या शजर पड़े हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
बद-गुमानी न हो क्यूँ तब के गए पर अफ़्ज़ूँ
देख उखड़े लब-ए-माशूक़ के तबख़ाल की खाल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
ऐसे हाल में अब तुम मेरे ख़याल में आते हो कैसे
उखड़े उखड़े से शब को थके हाल में आते हो कैसे
गीतांजली गीत
ग़ज़ल
'मुसहफ़ी' साँग से क्या उखड़े है पश्म उस की भला
सौ तरह से हो जिसे याद ज़बाँ का बहरूप
