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नज़्म
जुदाई
ज़मीं से उखड़े जाते हैं दरख़्तों के क़दम पैहम
चटानें रूप बदले ज़ेर-ए-लब कुछ पढ़ती जाती हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
देखा तो इस चमन में बाद-ए-ख़िज़ाँ के हाथों
उखड़े हुए ज़मीं से क्या क्या शजर पड़े हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
बद-गुमानी न हो क्यूँ तब के गए पर अफ़्ज़ूँ
देख उखड़े लब-ए-माशूक़ के तबख़ाल की खाल
