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ग़ज़ल
मिरे जुनूँ से हरीफ़ों के पाँव उखड़ते हुए
मैं जान देने के चक्कर में जाँ बचाता हुआ
इरशाद ख़ान सिकंदर
ग़ज़ल
यहाँ तो सब हमारी जाँ को नासेह बन के आते हैं
वहाँ जाते हुए दिल छूटते हैं दम उखड़ते हैं
निज़ाम रामपुरी
नज़्म
उखड़ते ख़ेमों का दर्द
अक़ीदे ज़ख़्मों से चूर पैहम कराहते हैं
यक़ीन की साँस उखड़ चली है
मज़हर इमाम
नज़्म
समझौता
मिरे यार मुझे समझाते हैं
मैं उस के दुख में डूबा हूँ मिरे साँस उखड़ते जाते हैं


