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ग़ज़ल
'उम्र गई उल्फ़त-ए-ज़र जी से इलाही न गई
मू सफ़ेद हो गए पर दिल की सियासी न गई
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
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रेख़्ता शब्दकोश
KHudaa jis ko bachaa.e us par aafat kyo.n kar aa.e
ख़ुदा जिस को बचाए उस पर आफ़त क्यों कर आए خُدا جِس کو بَچائے اُس پَر آفَت کیوں کر آئے
अल्लाह की हिफ़ाज़त में कोई आफ़त नहीं आ सकती
jis ko KHudaa bachaa.e us par kabhii na aafat aa.e
जिस को ख़ुदा बचाए उस पर कभी न आफ़त आए جِس کو خُدا بَچائے اُس پَر کَبھی نَہ آفَت آئے
जिस की ईश्वर रक्षा करे उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता
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ग़ज़ल
अलम-नशरह हुआ सिर्र-ए-ख़फ़ी हिज़्यान-ए-मस्ती में
असर था 'ज़ार' ये शुर्ब-ए-शराब-ए-हाल-ए-विज्दाँ का
पंडित त्रिभुवननाथ ज़ुतशी ज़ार देहलवी
ग़ज़ल
नहीं कोई ठिकाना रहरवान-ए-राह-ए-उल्फ़त का
बिठा दे जिस जगह वामांदगी वो उन की मंज़िल है
पंडित त्रिभुवननाथ ज़ुतशी ज़ार देहलवी
ग़ज़ल
इसी मिट्टी का ग़म्ज़ा हैं मआरिफ़ सब हक़ाएक़ सब
जो तुम चाहो तो इस जुमले को लौह-ए-ज़र पे लिख देना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
नशा उतरा मगर अब भी तुम्हारी मस्त आँखों से
पिए थे जो मय-ए-उल्फ़त के साग़र याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
हज़ार शर्म करो वस्ल में हज़ार लिहाज़
न निभने देगा दिल-ए-ज़ार ओ बे-क़रार लिहाज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अल्फ़ाज़ कहाँ से लाऊँ छाले की टपक को समझाऊँ
इज़हार-ए-मोहब्बत करते हो एहसास-ए-मोहब्बत क्या जानो