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नज़्म
गुल-ए-रंगीं
तू शनासा-ए-ख़राश-ए-उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं
ऐ गुल-ए-रंगीं तिरे पहलू में शायद दिल नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अगर इरफ़ान-ए-हस्ती उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं होता
तो फिर इंसानियत का कोई मुस्तक़बिल नहीं होता
इफ़्तिख़ार अहमद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
गुज़र रहा हूँ जुनूँ की जिलौ में ऐ 'मुश्किल'
ये ज़ौक़ ले के चला है कहाँ नहीं मा'लूम
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
ग़ज़ल
दुनिया में अभी तक बाक़ी हैं जाबिर भी कई ज़ालिम भी कई
हैरत तो यही है ऐ 'मुश्किल' इंसान सभी कहलाते हैं
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
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ग़ज़ल
'मुश्किल' अगरचे अज़्म करें पुख़्तगी के साथ
नज़्म-ए-चमन बदल के रहें आज ही से हम
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
ग़ज़ल
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
ग़ज़ल
गर गश्ता हुए हम न खुला ज़ुल्फ़ का उक़्दा
क्या पेच अब इस उक़्दा-ए-मुश्किल ने दिखाया
नवाब नजीर अल दोला
ग़ज़ल
इस ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन सीं सनम खोल कर गिरह
'आशिक़ के दिल के उक़्दा-ए-मुश्किल कूँ हल किया
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
मुझे ये डर है हर हर उज़्व मेरा दिल न बन जाए
मोहब्बत का ये उक़्दा उक़्दा-ए-मुश्किल न बन जाए
अमजद नजमी
ग़ज़ल
तिरे दर के सिवा सज्दों को बहलाने कहाँ जाते
हम आख़िर उक़्दा-ए-मुश्किल को सुलझाने कहाँ जाते