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ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
उठावें क्यूँ न नकतोड़े कि हम चाकर हैं उल्फ़त के
वगरना तुम से आलम में हैं बहतेरे मियाँ साहिब
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
यही जमाल-ए-गुल-ओ-सुख़न है तो आ चमन से धुआँ उठावें
रविश रविश पर बिछे रहेंगे ये लाला-ओ-गुल के दाम कब तक
मंज़ूर हुसैन शोर
कुल्लियात
सर न बालीं से उठावें काशके बीमार-ए-'इश्क़
होगा यक हंगामा बरपा फ़ित्ना ज़ेर-ए-सर हैं हम
मीर तक़ी मीर
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रेख़्ता शब्दकोश
mere laalaa kii ulTii riit saavan maas uThaave.n bhiit
मेरे लाला की उल्टी रीत सावन मास उठावें भीतمیرے لالَہ کی اُلٹی رِیت ساوَن ماس اُٹھاویں بِھیت
मेरे लाल का उल्टा काम है कि सावन के महीने में दीवार बनाता है
taqdiir kaa khoTaa kyo.n na uThaave ToTaa
तक़दीर का खोटा क्यों न उठावे टोटाتَقْدِیر کا کھوٹا کیوں نَہ اُٹھاوے ٹوٹا
दुर्भाग्यशाली सदैव हानि उठता है
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ग़ज़ल
वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था
अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़
मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं