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ग़ज़ल
बे-ज़िया सूरज के फिरने से हो जैसे आइना
नूर-ए-जाँ दिल से गया जूँ उस का रुख़ मुझ से मुड़ा
वली उज़लत
ग़ज़ल
सितम से दी तसल्ली उस कमाँ-अबरू के क़ुर्बां हूँ
रग-ए-जाँ कर दिया दिल को मिरे तीर-ए-निगाह अपना
वली उज़लत
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ग़ज़ल
वो ज़ुल्फ़-ओ-रू से जग है कुफ़्र-ओ-ईमाँ के तरद्दुद में
दो दिल करने कूँ इक आलम के मेरा शोख़ पक्का है
वली उज़लत
ग़ज़ल
वली उज़लत
ग़ज़ल
गर्दिश-ए-चश्म-ए-सजन ले गया ख़ातिर से ग़ुबार
उस को दश्त-ए-दिल-ए-'उज़लत' का बगूला समझूँ
वली उज़लत
ग़ज़ल
फ़स्ल-ए-गुल आते ही 'उज़लत' दिल ज़बान-ए-आह से
मेरी ख़िदमत में करे है दश्त में जाने की अर्ज़
वली उज़लत
ग़ज़ल
चमन का शहर फ़स्ल-ए-गुल में जब आबाद था 'उज़लत'
सबा के रंग में गुल-गश्त कर हज़्ज़-ए-जुनूँ पाया
वली उज़लत
ग़ज़ल
अता कर सीम शबनम जूँ हँसी सुब्ह अपने एहसाँ पर
गिरह हुई गुल की पेशानी पर इज़्ज़त इस को कहते हैं