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नज़्म
हिसार-ए-तीरगी
तुझ को बख़्शी थी किरन अज़-राह-ए-दिल-सोज़ी मगर
तू समझता है कि ये जूद-ओ-सख़ा लुत्फ़-ओ-अतफ़
सलमान अंसारी
ग़ज़ल
यूँ तो अंदाज़-ए-बयाँ हैं दिल-नशीं सब के मगर
इक नए अंदाज़ में अफ़्कार-ए-हमदम देखिए
हमदम सिद्दीकी
ग़ज़ल
तुम्हें गुस्ताख़ मैं कैसे नज़र आया बताओ तो
मिरी हर वादी-ए-दिल-सोज़ी की तौक़ीर में तुम थे
अज़हर बख़्श अज़हर
नज़्म
आरज़ू राहिबा है
बे-कराँ इज्ज़ की जाँ-सोख़्ता वीरानी में
जिस में उगते नहीं दिल-सोज़ि-ए-इंसाँ के गुलाब
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
निगाह-ए-नाज़ में दिल-सोज़ी-ए-नियाज़ कहाँ
ये आश्ना-ए-नज़र हैं दिलों के बेगाने
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
ग़ज़ल
जो रहा ख़ुद्दार होने पर ख़ुदी से दूर दूर
वो दयार-ए-इश्क़ ओ दिल-सोज़ी का वाली हो गया
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
अगर दिल वाक़िफ़-ए-नैरंगी-ए-तब-ए-सनम होता
ज़माने की दो-रंगी का उसे हरगिज़ न ग़म होता