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ग़ज़ल
वक़्त-ए-इमदाद है ऐ हिम्मत-ए-गुस्ताख़ी-ए-शौक़
शौक़-अंगेज़ हैं उन के लब-ए-ख़ंदाँ क्या क्या
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
ग़म नहीं मुझ को जो वक़्त-ए-इम्तिहाँ मारा गया
ख़ुश हूँ तेरे हाथ से ऐ जान-ए-जाँ मारा गया
इम्दाद इमाम असर
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har ki aamad 'imaarat-e-nau saaKHt, raft-o-manzil ba diigare pardaaKHt
हर कि आमद 'इमारत-ए-नौ साख़्त, रफ़्त-ओ-मंज़िल ब दीगरे परदाख़्त ہَر کِہ آمَد عِمارَتِ نَو ساخْت، رَفْت و مَنزِل بَہ دِیگَرے پَرداخت
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जो आया इस ने एक नई इमारत बनाई वो चला गया और मकान किसी और का हो गया, हर एक शख़्स अपने ही ख़्याल के मुताबिक़ काम करता है नीज़ नया हाकिम नया हुक्म जारी करता है , हर शख़्स अपनी फ़हम के मुताबिक़ काम करता है
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ग़ज़ल
कोई दौलत नहीं 'इमदाद' अपने दस्त ओ दामन में
फ़क़त यादों के सिक्के दिल तिजोरी में रखे होंगे
इम्दाद हमदानी
ग़ज़ल
फ़र्श-ए-राहत पर मुझे जिस वक़्त याद आता है यार
मुर्ग़-ए-दिल ऐसा फड़कता है कि उड़ जाती है नींद
इमदाद अली बहर
ग़ज़ल
इमदाद अली बहर
ग़ज़ल
क्या पिघलता जो रग-ओ-पै में था यख़-बस्ता लहू
वक़्त के जाम में था शोला-ए-तर ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
उजाले की लकीर
साक़ी-ए-वक़्त के रुख़्सार पे लहराया है
ये है तारीक फ़ज़ाओं में उजाले की लकीर
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
चलते हैं कू-ए-यार में है वक़्त-ए-इम्तिहाँ
हिम्मत न हारना दिल-ए-बीमार देखना