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नज़्म
अमर जोत
वरक़ तारीख़ ने तेज़ी से उल्टे
तग़य्युर ले के साज़-ओ-बर्ग-ए-ता'मीर-ए-जहाँ आया
ज़किया सुल्ताना नय्यर
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नज़्म
हुस्न-ए-क़ुबूल
तड़प रहा है अभी मुझ में साज़-ओ-बर्ग-ए-नुमू
ये मेरी कलियाँ ये पत्ते अभी तो ज़िंदगी हूँ
तसद्द्क़ हुसैन ख़ालिद
ग़ज़ल
क्यूँ साज़-ओ-बर्ग-ए-हस्ती करता है तू मुहय्या
दुनिया को है अज़ल से ज़ौक़-ए-फ़ना-परस्ती
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
लहलहाते थे चमन मफ़्तूँ गुलों पर थे बहार
लुट गई बू-बास ऐ बर्ग-ए-ख़िज़ानी अब कहाँ
आग़ा हज्जू शरफ़
नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
आरास्ता जिन के लिए गुलज़ार ओ चमन थे
जो नाज़ुकी में दाग़ दह-ए-बर्ग-ए-समन थे
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
वतन-आशोब
सब्ज़ा ओ बर्ग ओ लाला ओ सर्व-ओ-समन को क्या हुआ
सारा चमन उदास है हाए चमन को क्या हुआ