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ग़ज़ल
रहने दे ये तंज़ के नश्तर अहल-ए-जुनूँ बेबाक नहीं
कौन है अपने होश में ज़ालिम किस का गरेबाँ चाक नहीं
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
हम वही अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-वफ़ा साहिब-दिल
हम कि हर दौर में औराक़-ए-ज़माना के अमीं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
हम को ख़याल-ए-ख़िदमत-ए-अह्ल-ए-जहाँ तो है
ताक़त नहीं है पाँव में मुँह में ज़बाँ तो है
मुसव्विर लखनवी
ग़ज़ल
मौसम बदला रुत गदराई अहल-ए-जुनूँ बेबाक हुए
फ़स्ल-ए-बहार के आते आते कितने गिरेबाँ चाक हुए


