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ग़ज़ल
मौसम बदला रुत गदराई अहल-ए-जुनूँ बेबाक हुए
फ़स्ल-ए-बहार के आते आते कितने गिरेबाँ चाक हुए
ज़हीर काश्मीरी
शेर
पा लिया अहल-ए-जुनूँ ने फिर शहादत का मक़ाम
अक़्ल वाले मग़्फ़िरत की ही दुआ माँगा किए
मशकूर ममनून क़न्नौजी
ग़ज़ल
रहने दे ये तंज़ के नश्तर अहल-ए-जुनूँ बेबाक नहीं
कौन है अपने होश में ज़ालिम किस का गरेबाँ चाक नहीं


