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ग़ज़ल
मोहब्बत चारा-साज़-ए-दर्द-ए-फ़ुर्क़त होती जाती है
मिरी वहशत मुझे सामान-ए-राहत होती जाती है
कौकब मुरादाबादी
नज़्म
आगही का क़तरा क़तरा ज़हर
मिरे तशख़्ख़ुस के वास्ते मेरे मुहसिन-ओ-चारासाज़ लाते
रहे हैं बरसों
अकमल मुबारक गिलानी
ग़ज़ल
और किसी का ज़िक्र क्या जब न मुझी पे खुल सका
दर्द से मर रहा हूँ या हसरत-ए-चारा-साज़ में
बेख़ुद मोहानी
नज़्म
कई सद-हज़ार बरस के ख़्वाब
सादा ग़रीब मुख़लिस-ओ-चारा-साज़
यही लोग हिर्स में मुब्तला जो निकालें काम फ़रेब से